Monday, 2 April 2018

किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं

कि दिल किस ज़ख्म से आबाद होगा इसका अंदाजा नहीं
तेरे जी को क्या चाहिए इसका ख़ुद तेरे जी को पता नहीं
 
हुस्न की दहलीज़ पर जाकर भी तुम तश्ना-लब लौट आए
अब ख़ुद ही से तुम ये पूछो की क्या ये भी तेरी ख़ता नहीं 

ऐ! ख़ुशी तू मेरे पहलू में आते ही एक मातम बन जाती है
इस बात का मुझे एहसास है तू मुझे और कुछ भी बता नहीं

क्यूँकर बुलंदी की हर राह एक सन्नाटे पर ही ख़त्म होती है
कि क्या इसके अलावा कहीं भी बचा कोई और रास्ता नहीं

आज वो ज़ाम भी धोखा दे गया जिसमें कल तक ज़हर था
पूछा तो पता चला की उसका मुझसे अब कोई वास्ता नहीं

क्यूँ महज़ एक मौत के बाद फिर कोई सितमगर नहीं आया 
इस ज़हाँ में तो "धरम" किसी का किसी से कोई रिश्ता नहीं 

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