Sunday, 5 August 2018

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

रिश्ता महज़ दो ज़िस्मों के दरम्यां नहीं पनप सकता
दोनों रूहों का बराबर जुड़ना जरूरी होता है

संवेदनाओं की तरंगें जब दिल से निकलकर
बदन के हर रोम-कूप को जागते सहलाते
अपने होने का एहसास कराते
सर से पैर तक को सिहरन में डुबोते
सुख के अथाह सागर का देर तक अनुभव कराते
दिल और ज़िस्म के फ़ासले को मिटाते
दो सासों को एक करते

ज़हाँ के होने न होने के एहसास से इतर
दूर सितारों में कहीं घूमते हुए खो जाते
दोनों ज़िस्मों के अंदर संवेदना के
एक तीसरे ज़िस्म का निर्माण करते
और फिर उसमें दोनों समा जाते

संवेदना रूपी जिस्म के
अन्तः मन के उपजे किरण से
जब गैरों को
दो अलग-अलग जिस्मों का
बिब्म एक दिखने लगे

तो समझो रिश्ता मुकम्मल हुआ

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