नज़र से पिया हलक़ में उतारा मगर दिल में बसा न सका
रिश्ते के रूह को उसके ज़िस्म से कभी अलग पा न सका
वो नाम जब भी ज़ुबाँ पर आए तो आह! क्या तरन्नुम आए
ज़ुबाँ तो खुले मगर उसे कभी गुनगुना न सका गा न सका
मौसम बहार का खिज़ा का इश्क़ का या फिर तन्हाई का
इनमें कोई भी मौसम मेरे दहलीज़ तक कभी आ न सका
ख़ुर्शीद चिराग़ जुगनू हर किसी के रौशनी की नुमाईश हुई
बाबजूद इसके "धरम" कभी मेरे घर में उजाला छा न सका
रिश्ते के रूह को उसके ज़िस्म से कभी अलग पा न सका
वो नाम जब भी ज़ुबाँ पर आए तो आह! क्या तरन्नुम आए
ज़ुबाँ तो खुले मगर उसे कभी गुनगुना न सका गा न सका
मौसम बहार का खिज़ा का इश्क़ का या फिर तन्हाई का
इनमें कोई भी मौसम मेरे दहलीज़ तक कभी आ न सका
ख़ुर्शीद चिराग़ जुगनू हर किसी के रौशनी की नुमाईश हुई
बाबजूद इसके "धरम" कभी मेरे घर में उजाला छा न सका
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