मुन्सिफ़ का फैसला हो चुका मोहर भी लग गई सिर्फ सुनाना बाकी है
मगर क्यूँ अब भी लगता है कि उसकी यादों का आना-जाना बाकी है
दरख़्त के सूखे डाल पर अनजाने में बे-मौसम कोई पत्ता उग आया था
पत्ता साख़ से टूट चुका है मगर उसका अभी ज़मीं पर गिरना बाकी है
मेरे ये मोहब्बत के फूल यूँ ही सूख गए कुबूल किसी के भी न हो सके
मगर एक उम्मीद ज़िंदा है कि इसका अब फिर से निखरना बाकी है
न कभी इशारा हुआ न आहट हुई न किसी ने मुझको पलटकर देखा
बिना जंग के ही हार हुई बाद इसके भी मुझमें कोई दीवाना बाकी है
हो सके कि फिर से ज़ख्मों में जान आए दिल में दर्द बढ़े आह निकले
लगता ऐसा है "धरम" कि अभी मोहब्बत का भरम-ए-फ़साना बाकी है
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