Sunday, 22 March 2020

पहला वरक़ कुतर आया

जब भी कोई मंज़र देखना चाहा  सिर्फ पस-मंज़र नज़र आया
सूरत किसी और की नज़र आई चेहरा कोई और उभर आया

सब को मालूम है कि वो सितमगर है  मगर  फिर भी ऐसा क्यूँ
जब भी  फैसला उसके खिलाफ आया तो  सन्नाटा पसर आया

वो ज़िंदगी की  आखिरी शाम थी  वो करता भी तो  क्या करता
बस यूँ ही  उसकी  चौखट से होकर  आखिरी बार गुजर आया

जहाँ भी ज़मीं को आसमाँ से मिलाया गया तो वहां के फिज़ा में
सिर्फ एक बार बहार आई  औ" बाद उसके सिर्फ कहर आया

बात  पहले मोहब्बत से की गई  फिर ज़िंदगी  उधार माँगी गई
फिर शहादत बदनाम हुई  फिर नक़ाब इश्क़ का  उतर आया

सजा उसको सुनाई गई  सर किसी और का कलम किया गया
फिर किताब-ए-फैसला का 'धरम' वो पहला वरक़ कुतर आया

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.