Tuesday, 2 June 2020

न ही शक्ल नायाब हुई

जब भी कुछ लिखा  कागज़ की  शक्ल खराब हुई
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ  तो ज़िंदगी ही  अज़ाब हुई

ज़िंदगी जब तलक  ग़म के साये में थी महफूज़ थी
वो ग़म न था  ख़ुशी थी  जिससे  ज़िंदगी यबाब हुई

वो एक ख्वाईश थी  जो मिल भी गई तो कुछ नहीं
पहले भी  न कभी दिल जला न ज़िंदगी बेताब हुई 

ख़ुद ही के दो अलग-अलग  किरदार को मिलाया 
न तो सूरत-ए-कलम हुआ न सीरत-ए-ज़काब हुई

उसके हर बात पर अड़ा रहने का नतीजा 'नीरस' 
न तो ओहदा ऊँचा हुआ  न ही शक्ल  नायाब हुई 

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