खंज़र से लिखी बात को फिर क़लम से लिखा गया
मक़्तल की दास्ताँ को भी ख़ूब फ़हम से लिखा गया
क़त्ल होने वाले क़त्ल हुए लहू का कोई मोल न रहा
मक़्तल की दास्ताँ को भी ख़ूब फ़हम से लिखा गया
क़त्ल होने वाले क़त्ल हुए लहू का कोई मोल न रहा
औ" ज़ालिमों के नाम को बड़े अलम से लिखा गया
इंसान के आँखों में न तो लहू बचा न ही अश्क़ बचा
दास्ताँ उनकी उन्हीं के दिल-ए-लहम से लिखा गया
जब ख़याल ही जब्र था तो कोई हुदूद-ए-जब्र न रहा
सिर्फ़ एक ही बात थी जिसे भी वहम से लिखा गया
एक ज़ालिम की बात दूसरे ज़ालिम ने लिखी "धरम"
ख़िताब-ए-अम्न बताया बड़े ही रहम से लिखा गया
ख़िताब-ए-अम्न बताया बड़े ही रहम से लिखा गया
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