Friday, 3 June 2022

फिर क़लम से लिखा गया

खंज़र से लिखी बात को  फिर क़लम से लिखा गया
मक़्तल की दास्ताँ को भी ख़ूब फ़हम से लिखा गया  
  
क़त्ल होने वाले क़त्ल हुए लहू का कोई मोल न रहा 
औ" ज़ालिमों के नाम को बड़े  अलम से लिखा गया

इंसान के आँखों में न तो लहू बचा न ही अश्क़ बचा  
दास्ताँ उनकी उन्हीं के दिल-ए-लहम से लिखा गया 

जब ख़याल ही जब्र था तो कोई हुदूद-ए-जब्र न रहा 
सिर्फ़ एक ही बात थी  जिसे भी वहम से लिखा गया 
 
एक ज़ालिम की बात दूसरे ज़ालिम ने लिखी "धरम"
ख़िताब-ए-अम्न बताया  बड़े ही रहम से  लिखा गया

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