Sunday, 12 June 2022

नक़्शा बदलते देखा

सुबह को  शाम की  तरह  ढलते देखा 
लहू को  जाम की  तरह मचलते  देखा 

ता-उम्र  संग-ए-दिल के जमात में रहा  
हरेक  शख़्स का  चेहरा पिघलते देखा 

गांव  शहर  क़तरा दरिया औ"   इंसान   
हरेक  बज़्म का  नक़्शा  बदलते  देखा 

मुंसिफ़ के  सामने  एक  मुर्दे  की पेशी   
ताबूत से फिर  मुर्दे को  निकलते देखा 

हया की आढ़ में बे-हया हुस्न-औ-इश्क़ 
क्या ख़ूब एक  दूसरे को निगलते देखा

उम्र गुज़र गई "धरम" वक़्त ठहरा रहा 
उस एक लम्हा को  आग उगलते देखा  

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