सुबह को शाम की तरह ढलते देखा
लहू को जाम की तरह मचलते देखा
लहू को जाम की तरह मचलते देखा
ता-उम्र संग-ए-दिल के जमात में रहा
हरेक शख़्स का चेहरा पिघलते देखा
गांव शहर क़तरा दरिया औ" इंसान
हरेक बज़्म का नक़्शा बदलते देखा
मुंसिफ़ के सामने एक मुर्दे की पेशी
ताबूत से फिर मुर्दे को निकलते देखा
हया की आढ़ में बे-हया हुस्न-औ-इश्क़
क्या ख़ूब एक दूसरे को निगलते देखा
उम्र गुज़र गई "धरम" वक़्त ठहरा रहा
उस एक लम्हा को आग उगलते देखा
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