रास्ते बदलते हैं मगर वाक़ि'आ बदलता नहीं
कि क्यूँ बुलंदी से फ़ासला कभी बदलता नहीं
कि क्यूँ बुलंदी से फ़ासला कभी बदलता नहीं
ठोकर मारी गले लगाया कोई वास्ता न रखा
वो एक ऐसा पत्थर है जो कभी पिघलता नहीं
शम'-ए-महफ़िल उसके सामने लाया ही नहीं
वो ज़हर पीता तो है मगर कभी उगलता नहीं
सहरा रात तन्हाई मोहब्बत कई ज़माने देखे
इश्क़ ऐसा समंदर है जो कभी मचलता नहीं
सुबह दोपहर शाम रात बस जलता रहता है
लहू में ये कैसी ठंढक है कभी उबलता नहीं
न तो चलने सलीक़ा न ही मंज़िल का 'उबूर
ठोकर भी खाता है और कभी संभलता नहीं
यार की बातें प्यार की बातें तकरार की बातें
कैसा दिल है की "धरम" कभी बहलता नहीं
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