चाँद ख़ुद अब अपनी चाँदनी को रास्ता नहीं देता
मोहब्बत में अब कोई किसी को वास्ता नहीं देता
मोहब्बत में अब कोई किसी को वास्ता नहीं देता
टूटे हुए लम्हों का समंदर दिल से लपेटकर रखा
एक भी लम्हा दिल में उफान आहिस्ता नहीं देता
क्यूँ ख़ुद से भी यदि रु-ब-रु होता हूँ तो वो विसाल
एक मुस्तक़बिल देता है कोई गुज़िश्ता नहीं देता
हर वाक़ि'आ मोहब्बत का ज़ुबाँ पर है तो मगर
वो बयान तो देता है हाँ! कभी नविश्ता नहीं देता
तेरा हाथ थामा तो ऐसा लगा कि क़र्ज़ बढ़ने लगा
ये एहसास 'धरम' क्यूँ कोई और रिश्ता नहीं देता
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