Saturday, 21 January 2023

जिस्म से हमेशा मरदूद रहा

कभी हमशक्ल बनकर कभी साया बनकर मौजूद रहा 
ख़ुद अपने उरूज-ओ-ज़वाल में कब अपना वुजूद रहा

कि क्यूँ कोई भी साँस  सीने में कभी पूरी न उतर सकी  
वक़्त को कलेजे से न लिपटने का हमेशा एक ज़ूद रहा  

कि इस दिल की बे-क़रारी को चैन कभी आए भी कैसे  
जब ये दिल ख़ुद अपने भी जिस्म से हमेशा मरदूद रहा

आईने ने शक्ल पहचाना भी औ" नज़र भी मिलाए रखा     
मगर दरमियाँ आईने और चेहरे के गुफ़्तुगू मस्दूद रहा  

न तो कभी दिखाई दिया न ही किसी को महसूस हुआ  
फिर भी एक मुंसिफ़ की हुक्मरानी में  वो मशहूद रहा  
 
वो शख़्स कौन था जिसने अपनी साँसें मेरे कलेजे में दी   
औ" जिस्म में उतरकर भी 'धरम' ता-उम्र मफ़क़ूद रहा


वुजूद - अस्तित्व
ज़ूद - जल्दी
मरदूद - बहिष्कृत
मस्दूद - रुका हुआ
मशहूद - जो उपस्थित किया गया हो
मफ़क़ूद - अज्ञात

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.