तख़्त ने फ़रियादी के लहू को जब फ़िज़ा में घोल दिया
ज़माने ने उसके लहू को भी पानी के मोल-तोल दिया
कब वफ़ा की क़सम में बंधे एक चराग़ की लौ में जले
कब तिरे दिल ने मेरे दिल को बराबर का मोल दिया
वफ़ा-ए-इश्क़ को आँखों में उतारा सीने में दफ़्न किया
फिर क्यूँ ज़माने के सामने अपना कलेजा खोल दिया
वो वफ़ा की बात हुई एक चराग़-ए-वफ़ा जलाया गया
फिर हर वफ़ा की राह में वीरान कोई एक जोल दिया
जब भी ज़बाँ ख़ामोश रही तब चेहरा बस जलता रहा
कुछ तो नज़रों ने कहा कुछ यूँ साँसों ने भी बोल दिया
कि "धरम" तेरी बातें तेरी नज़र तिरा चेहरा तिरा जादू
ख़ुदा ने पूरी काइनात को ये भरम ख़ूब अनमोल दिया
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