Friday, 5 May 2023

ग़ैरों का लहू आज़माना है

सितम का शक्ल जो भी हो  फ़क़त देखते जाना है
तौर-ए-वफ़ा यह है  कि हर ज़ुल्म पर मुस्कुराना है 

जब ख़याल यह है कि कोई रास्ता निकल आना है  
तब बात अपनी कहकर  क्यूँ फ़िर दिल दुखाना है
  
काग़ज़ क़लम रौशनाई का एक 'अजब ज़माना है 
यहाँ ख़ुद की क़लम में  ग़ैरों का लहू आज़माना है 

दीवानों की एक बस्ती है या हिज़्र का अफ़्साना है     
जो भी दीवाना है ख़ुद अपने ही रूह से बेगाना है  

ये एक रूहानी रिश्ता है बड़े अदब से निभाना है  
जिस्म से पहले रूह मर गया अब क्या सुनाना है 

ये महफ़िल हुक्मरानों की है  यहाँ ऐसा फ़साना है   
बतौर-ए-हुनर 'धरम' यहाँ तौर-ए-क़त्ल दिखाना है 

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