तल्ख़ियाँ कुछ कम न थीं फिर भी नज़र मिलाते रहा
दोनों हद्द-ए-अदब में रहे दोनों का दिल दुखाते रहा
यूँ एक भी लम्हा साथ उसके कभी बसर हो न सका
नज़र ख़्वाब दिल दिमाग़ सब जिस पर लुटाते रहा
न दोस्त न रक़ीब न साथ उसके अपना चेहरा ही था
आईने में ख़ुद के शक्ल को क़रीब अपने बुलाते रहा
एक बेचैनी सी छाई रही आँखों में नींद भी आई नहीं
वक़्त से लिपटा तो न जाने कौन किसको सुलाते रहा
धूप चाँदनी चिराग़ सब से दिल को कुछ बेचैनी रही
फ़िर ख़ुद अपने परछाँई में जिस्म अपना छुपाते रहा
फ़ैसला-ए-जुदाई भी था मिलने का एक वादा भी था
दोनों ही महज़ फ़रेब था "धरम" रात भर सताते रहा
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