Monday, 1 January 2024

चाँदनी फिर मचल जाएगी

पता न था बज़्म में बात ऐसी भी चल जाएगी  
मायूसी  किसके दर पर पहले-पहल जाएगी
 
ख़ुशी का दामन अब और कितना थामना है 
थोड़ी देर और ठहर की शक्ल बदल जाएगी 

उन्हें गुमाँ है की बुलंदी उनके क़दमों तले है  
यकीं मान वो ज़मीं क़दमों से निकल जाएगी
 
जो रात आज आई है कल फिर वही आएगी
एक ख़बर थी कि चाँदनी फिर मचल जाएगी 

जो वादा था की अब ये मुलाक़ात आख़िरी है 
किसे ख़बर थी कि वो बात फिर टल जाएगी 

दो नज़रों का चिराग़ था रौशनी शबाब पर थी 
यक़ीं न था वो कि बुझने से पहले ढल जाएगी

दुआ की कुछ बात मुँह से निकल गई 'धरम' 
ये ख़याल न था की ज़ुबाँ ऐसे फिसल जाएगी     

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.