Sunday, 15 September 2024

ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

अलावा दो जिस्मों के कई और रूह भी शामिल थे
उस क़त्ल में शरीक़ न जाने कितने सारे क़ातिल थे

उस ज़ख़्म के अलावा और कोई ज़ख़्म था ही नहीं    
एक ही सुराख़ था मगर ख़ंज़र कई सारे दाख़िल थे

क़ातिल ने अपना पता बदला भी महफूज़ भी रखा 
शिकार उसके सारे के सारे इस बात से ग़ाफ़िल थे
    
आँखों में मायूसी संभल न सकी ख़ुशी छलक आई
रिश्ता कैसा टूटा जिसमें दोनों के दोनों ला-ज़िल थे

महज़ एक मसअला पर हर किसी की आबरू गई   
कहने को तो महफ़िल में सारे के सारे इफ़ाज़िल थे

वो इलाक़ा कैसा था "धरम" वहाँ रिवायतें कैसी थी       
सारे के सारे नक़ाब-पोश वहाँ शान-ए-महफ़िल थे  
 
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ग़ाफ़िल : बेख़बर
ला-ज़िल : वह सोना जिसमें ज़रा भी खोट न हो
इफ़ाज़िल : प्रतिष्ठित जन / बड़े लोग

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