सीने में क्यूँ उठ रहा है धुआँ फिर से
क्या कोई दर्द दे रहा है बयाँ फिर से
कि वो ज़ख़्म हो गया है जवाँ फिर से
लो बदल गया है तर्ज़-ए-बयाँ फिर से
सज़दे में आ गया है आसमाँ फिर से
किसकी छिड़ गई है दास्ताँ फिर से
देख बिछड़ रहा है हम-रहाँ फिर से
झोंका से खुल गया है बादबाँ फिर से
कर्बला में हो रहा है इम्तिहाँ फिर से
यहाँ मिटने वाली है हस्तियॉं फिर से
"धरम" घटने लगी है दूरियाँ फिर से
लो उजड़ने लगी है बस्तियाँ फिर से
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