Wednesday, 30 April 2025

दिल को कभी हैरत में न रखना

आँसुओं को बरसने देना यूँ किसी सियासत में न रखना  
दुनियाँ बड़ी ज़ालिम है दिल को कभी हैरत में न रखना

जज़्बात दिल-ओ-दिमाग की खेती है अनमोल फसल है  
तिरे जज़्बात तेरे अपने हैं  ग़ैरों की हिरासत में न रखना

आरज़ू-ए-दिल है मोहब्बत बुलँद है कोई ख़ौफ़ भी नहीं 
इस बार तू क़ुबूल कर यूँ इसे फिर से तुर्बत में न रखना

उरूज़ बढ़ता गया कदम मुसलसल मुख़्तसर होते गये 
तन्हाई ही मंज़िल है मगर दिल को ख़ल्वत में न रखना

कि आने वाली फ़िज़ा में मौसम सारे एक साथ आयेंगे
ये वक़्त का क़हर है मज्लिस-ए-'अदालत में न रखना

कि यहाँ आईना तीरगी में भी शक्ल दिखाता है "धरम" 
तुम अपनी शक्ल से ख़ुद को अजनबिय्यत में न रखना 

.....................................................

तुर्बत : कब्र
ख़ल्वत : तन्हाई

Friday, 4 April 2025

पत्थरों के बयान और भी होंगे

आगे बढ़ो कि ज़ख़्मों के निशान और भी होंगे 
राह में मील के पत्थरों के बयान और भी होंगे
  
बुलंदी की मंज़िल पर  तू अभी पहुँचा कहाँ है  
बस बढ़ते चलो की आगे ढलान और भी होंगे
 
वो बात महज़ उस एक लम्हे की न रही होगी      
पुराने लम्हे  दोनों के दरमियान और भी होंगे

ख़बर न थी बज़्म में रात ख़ामोशी में गुजरेगी
यूँ महफ़िल में शामिल बे-ज़बान और भी होंगे

दिल में कोई याद नहीं ज़ख़्म सारा भर चुका
अब तो इस दिल के इम्तिहान और भी होंगे

एक ही बार में तीर निशाने तक नहीं पहुँचा  
कि दरमियान दोनों के कमान और भी होंगे

जो तख़्त-नशीं थे उनको कभी यकीं न हुआ        
कि उन आक़ाओं के हुक्मरान और भी होंगे

समंदर अभी पूरी तरह से सोया नहीं "धरम" 
कि लहरें और भी होंगीं उफान और भी होंगे