Friday, 4 April 2025

पत्थरों के बयान और भी होंगे

आगे बढ़ो कि ज़ख़्मों के निशान और भी होंगे 
राह में मील के पत्थरों के बयान और भी होंगे
  
बुलंदी की मंज़िल पर  तू अभी पहुँचा कहाँ है  
बस बढ़ते चलो की आगे ढलान और भी होंगे
 
वो बात महज़ उस एक लम्हे की न रही होगी      
पुराने लम्हे  दोनों के दरमियान और भी होंगे

ख़बर न थी बज़्म में रात ख़ामोशी में गुजरेगी
यूँ महफ़िल में शामिल बे-ज़बान और भी होंगे

दिल में कोई याद नहीं ज़ख़्म सारा भर चुका
अब तो इस दिल के इम्तिहान और भी होंगे

एक ही बार में तीर निशाने तक नहीं पहुँचा  
कि दरमियान दोनों के कमान और भी होंगे

जो तख़्त-नशीं थे उनको कभी यकीं न हुआ        
कि उन आक़ाओं के हुक्मरान और भी होंगे

समंदर अभी पूरी तरह से सोया नहीं "धरम" 
कि लहरें और भी होंगीं उफान और भी होंगे 

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