आँसुओं को बरसने देना यूँ किसी सियासत में न रखना
दुनियाँ बड़ी ज़ालिम है दिल को कभी हैरत में न रखना
जज़्बात दिल-ओ-दिमाग की खेती है अनमोल फसल है
तिरे जज़्बात तेरे अपने हैं ग़ैरों की हिरासत में न रखना
आरज़ू-ए-दिल है मोहब्बत बुलँद है कोई ख़ौफ़ भी नहीं
इस बार तू क़ुबूल कर यूँ इसे फिर से तुर्बत में न रखना
उरूज़ बढ़ता गया कदम मुसलसल मुख़्तसर होते गये
तन्हाई ही मंज़िल है मगर दिल को ख़ल्वत में न रखना
कि आने वाली फ़िज़ा में मौसम सारे एक साथ आयेंगे
ये वक़्त का क़हर है मज्लिस-ए-'अदालत में न रखना
कि यहाँ आईना तीरगी में भी शक्ल दिखाता है "धरम"
तुम अपनी शक्ल से ख़ुद को अजनबिय्यत में न रखना
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तुर्बत : कब्र
ख़ल्वत : तन्हाई
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