Wednesday, 30 April 2025

दिल को कभी हैरत में न रखना

आँसुओं को बरसने देना यूँ किसी सियासत में न रखना  
दुनियाँ बड़ी ज़ालिम है दिल को कभी हैरत में न रखना

जज़्बात दिल-ओ-दिमाग की खेती है अनमोल फसल है  
तिरे जज़्बात तेरे अपने हैं  ग़ैरों की हिरासत में न रखना

आरज़ू-ए-दिल है मोहब्बत बुलँद है कोई ख़ौफ़ भी नहीं 
इस बार तू क़ुबूल कर यूँ इसे फिर से तुर्बत में न रखना

उरूज़ बढ़ता गया कदम मुसलसल मुख़्तसर होते गये 
तन्हाई ही मंज़िल है मगर दिल को ख़ल्वत में न रखना

कि आने वाली फ़िज़ा में मौसम सारे एक साथ आयेंगे
ये वक़्त का क़हर है मज्लिस-ए-'अदालत में न रखना

कि यहाँ आईना तीरगी में भी शक्ल दिखाता है "धरम" 
तुम अपनी शक्ल से ख़ुद को अजनबिय्यत में न रखना 

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तुर्बत : कब्र
ख़ल्वत : तन्हाई

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