मसीहा ही क़ातिल है हुक्मरान ख़ामोश है
कि क़ातिल के लहू में बहुत गरम-जोश है
कभी फूलों को हटाईये गिरेबाँ तो देखिए
कि बर्षों से तो आपकी गर्दन गुल-पोश है
आप न तो यहाँ आईये न ही दिल लगाईये
सबकी तबी'अत तो यहाँ ख़ाना-ब-दोश है
कैसा क़र्ज़ है कि रस्म-अदायगी पता नहीं
अब खाली हो चुका अपना वफ़ा-कोश है
पहले नज़दीक आईये फिर हाथ मिलाईये
कि यहाँ हाथ मिलाना भी एक आग़ोश है
मंज़िल-ए-मक़सूद जब नज़र में आ गया
फिर बाद उसके बची ज़िंदगी बे-जोश है
अब क्या बात करें किससे नज़र मिलायें
यहाँ सबका चेहरा तो "धरम" रू-पोश है
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