Monday, 11 August 2025

दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

यादों का झोंका कभी सुकूँ से सोने नहीं दिया
कि सलोने सपनों को कभी संजोने नहीं दिया

उसे बुत-ए-मसीहा के अलावा और क्या कहूँ 
वो जो तन्हाई में भी कभी मुझे रोने नहीं दिया

मेरे क़त्ल की गवाही वो ख़ंज़र ख़ुद देता रहा       
कैसा ख़ंज़र था दाग ख़ून का धोने नहीं दिया

आज महताब नक़ाब में है रात भी शरमाई है  
महफ़िल ने चाँदनी को धूमिल होने नहीं दिया
  
उसका क़तरा पर कभी तो कोई एहसान था  
जो समंदर ने उसे ख़ुद को डुबोने नहीं दिया

अपने साये से बिछड़कर रौशनी खोजता है 
शख़्स जो कभी कोई  सूरज बोने नहीं दिया

दोस्ती की चादर  उसके साथ ओढ़ूँ तो कैसे 
वो तो एक भी सूत "धरम" पिरोने नहीं दिया 

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.