Tuesday, 21 October 2025

रहबर का तमाशा देखिए

सफ़र में निकले हैं रहबर का तमाशा देखिए
मंज़िल फ़तह करने वालों की हताशा देखिए

तख़्त मिलते ही ज़ेहन में जिन्न पैवस्त हो गया
लहू में सना है ये ताज़ कैसे बे-तहाशा देखिए

मंज़िल ख़ुद ही हैरान है कौन उसको खा गया
फ़लक़ की आँखों में छाई यह निराशा देखिए

गूँगों की आवाज़ में आज ऐसी ताक़त आ गई
बहरों के कानों तक पहुँची इर्ति'आशा देखिए

अभी तो उम्र शुरू हुई है हयात पूरी बाक़ी है 
अभी से ज़मीं में गड़ने का मत तहाशा देखिए

इंसानों की जमात है इंसानियत की ही बात है 
सबके ज़ेहन में छुपा 'धरम' एक रा'शा देखिए

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इर्ति'आशा: प्रतिध्वनि
तहाशा : भय / डर
रा'शा : कंपन / थरथराहट

Monday, 13 October 2025

सफ़ीना मस्ती में टहलता है

फ़लक में ख़ुर्शीद पहले की तरह कहाँ निकलता है 
मग़रिब-ओ-मशरिक़ किसी के इशारे पर चलता है
 
ये दिल भी तो अब कहाँ पहले की तरह उबलता है 
सीने में घुसकर  अब कहाँ कोई दिल को मलता है 

उरूज यहाँ ख़ुद ही जवाल की तरफ़ फिसलता है
बशर मंज़िल पाकर अपनी ही हस्ती को छलता है

यहाँ चिलमन शक़्ल  देखकर रंग अपना उगलता है   
आलम-ए-पस-ए-चिलमन है कहाँ कोई संभलता है

माज़ी मौजूदा मुस्तक़बिल एक दूसरे को निगलता है
मगर संगीन कलम को अपनी चुटकी में मसलता है

कि लहरों के चढ़ाव पर सफ़ीना मस्ती में टहलता है 
यह देखकर 'धरम' समंदर अब और भी उछलता है