फ़लक में ख़ुर्शीद पहले की तरह कहाँ निकलता है
मग़रिब-ओ-मशरिक़ किसी के इशारे पर चलता है
ये दिल भी तो अब कहाँ पहले की तरह उबलता है
सीने में घुसकर अब कहाँ कोई दिल को मलता है
उरूज यहाँ ख़ुद ही जवाल की तरफ़ फिसलता है
बशर मंज़िल पाकर अपनी ही हस्ती को छलता है
यहाँ चिलमन शक़्ल देखकर रंग अपना उगलता है
आलम-ए-पस-ए-चिलमन है कहाँ कोई संभलता है
माज़ी मौजूदा मुस्तक़बिल एक दूसरे को निगलता है
मगर संगीन कलम को अपनी चुटकी में मसलता है
कि लहरों के चढ़ाव पर सफ़ीना मस्ती में टहलता है
यह देखकर 'धरम' समंदर अब और भी उछलता है
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