आँखों में झाँको तो सिर्फ़ दहशत नज़र आती है
यहाँ से वहाँ तक बस भागने की ख़बर आती है
यह मुसीबत फ़क़त कोई मौजूदा दौर का नहीं
माज़ी के हरेक लम्हें में यह सज-सँवर आती है
मौजों को उरूज तक जाने दो बीच में न टोको
ज़रा देखो तो सही बलंदी किस-क़दर आती है
अपनी बात भी अपने कानों तक नहीं पहुँचती
तहज़ीब से की गई हर बात बे-असर आती है
बैठना उठना चलना यूँ मुसलसल चलता रहा
बहार कब किसके साथ चलकर घर आती है
दिल को ग़र खोदोगे तो मलवा निकल आएगा
उन लम्हों के याद आने से आँखें भर आती है
कि इस बार भी बेचैनी वैसी की वैसी ही रही
आँखों में नींद "धरम" कब वक़्त-पर आती है
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