Monday, 5 December 2016

अकड़कर खड़ा रहने में कोई भला नहीं

जो मील का पत्थर था वो अपने ज़गह से हिला नहीं
की पूरा कारवां गुज़र गया मगर उससे कोई मिला नहीं

उसकी ख्वाईश की सीढ़ी आसमाँ से भी ऊँची निकल गई
हाँ मगर हक़ीक़त यह हुआ की वहां कोई महल बना नहीं

की हिम्मत हर बार मुफ़लिसी के सामने घुटने टेक देती है
आज फिर से उसके सितम पर इसका कोई ज़ोर चला नहीं

हुक़्म की ग़ुलामी औ" एहसान तले झुका हुआ उसका सर
की आज कट भी जाये तो उसको खुद पर कोई गिला नहीं

तारों-सितारों की बातें आसमानी हैं कुछ हक़ीक़त नहीं होता
अब समझ आया की ऐतवार करके मिलता कोई सिला नहीं

इस बार के गर्दिश-ए-ऐय्याम को झुककर सलाम करना है
उसके सामने अकड़कर खड़ा रहने में 'धरम' कोई भला नहीं

Monday, 28 November 2016

चंद शेर

1.
तुम्हारे हाथों ही क़त्ल होना था ये पता न था मुझे
ऐ! वक़्त अपनी वफाई "धरम" बता न सका तुझे

2.
ग़म-ए-आशिक़ी "धरम" ज़माने भर के ग़म से कम नहीं
ज़िन्दगी तेरी मोहब्बत भी अब किसी ख़म से कम नहीं

3.
अफवाहों का दौर था मैंने भी एक पत्थर उछाल दिया
वरना इतनी हिम्मत कहाँ "धरम" की कुछ बोल पाऊँ

4.
ऐ! ज़िन्दगी मैं भी रफ़्तार में था मगर न जाने क्यूँ
जान बूझकर बैठ गया और मंज़िल गँवा दिया मैंने

5.
जो भी याद आया वो सबकुछ भुला दिया मैंने
एक-एक कागज़ चुनकर "धरम" जला दिया मैंने

6.
कहाँ है वो घूंट मय का जो प्यासे का गला तर कर दे
उतरकर सीने में "धरम" सारे ज़ख्मों को सर कर दे

7.
वो सारे जो कभी मुन्तज़िर थे तेरे "धरम" अब चले गए
वो सारे रहगुज़र चले गए औ" वो सारे रास्ते भी चले गए

8.
चलो इस बात पर ही "धरम" तुमको याद कर लिया जाए
बुझे दिल पर जमे राख को फिर से साफ़ कर लिया जाए


Friday, 25 November 2016

मुर्दे गुनगुनाने लगे हैं

जो सारे मुर्दे थे अचानक गुनगुनाने लगे हैं
औ" जो सारे ज़िंदा थे वो बड़बड़ाने लगे हैं

यूँ देखो तो ये आग सब के घर में बराबर लगी है
मगर कुछ लोग इसे जलाने तो कुछ बुझाने लगे हैं

यहाँ राग तो महज़ एक ही छेड़ी गई थी
मगर कुछ नाचने तो कुछ चिल्लाने लगे हैं

वो गुज़रा वक़्त भी क्या खूब कमाल कर गया
दौलत आज खुद मुफ़लिसों को बुलाने लगे हैं

सामने एक मंज़र औ कितने सारे पश-मंज़र
ये क्या की लोग अपना ही चेहरा छुपाने लगे हैं

अपनी मक्कारी पर मुफ़लिसों का राग चढ़ाये "धरम"
क्या खूब मुफ़लिसों के हिमायती सामने आने लगे हैं

Sunday, 6 November 2016

मुर्दे को सँवारा है

जो सपना कल दुश्मन का था आज हक़ीक़त तुम्हारा है
ज़िंदा इंसान को पहले मारा और फिर मुर्दे को सँवारा है

अच्छे बुरे की सोच नहीं तुझे बस हर बात काटनी ही है
आज तुझको ये खुद पता नहीं की तुमको क्या गँवारा है

तुमने बात मुफ़लिस से शुरू की आज मुर्दे तक पहुच गए
तुझमें जो इंसां था वो मर गया जो ज़िंदा है बस आवारा है

जो तुमने झोली फैलाई तो सब ने अपना दाम उढेल दिया
अब जो तेरे साथ हैं उनका तो बस किस्मत का ही सहारा है

हर किसी ने तेरी ऊँगली थामकर आँख बंद कर ली "धरम"
सब को तुम वहां लेकर गए जहाँ बस मौत पर ही गुज़ारा है

Wednesday, 19 October 2016

बादशाहत ढूंढते ही रह गए

सारे मुर्दे उठकर एक साथ मंज़िल को निकल गए
हमें कोई हैरत न हुई औ" हम भी साथ चल दिए

मुर्दों में क्या बात थी कि फिसलकर भी संभल गए
औ" जो हम फिसले तो बस फिसलते ही रह गए

हवा के एक तेज झोंके में वो सारे मुर्दे साथ बह गए
वहां भी पिछले जैसा ही हुआ औ" हम अकेले रह गए

वफ़ा के बात पर सारे मुर्दों ने क्या खूब वफाई निभाई
औ" हम तो अपनों से बस बेवफाई ही करते रह गए

मुर्दे वहां गए जहाँ न कोई बादशाह था न ही कोई ग़ुलाम
हम अपनी मंज़िल में "धरम" बादशाहत ढूंढते ही रह गए

Tuesday, 20 September 2016

किसने किसको लूटा है

अपने उस अतीत को वहीँ से बनाना है जहाँ से वो टूटा है
आ कि मिल के खोजें रिश्ते का कौन सा हिस्सा ठूठा है

जब से बिछड़े थे तब से अब तक हम दोनों अकेले ही रहे
तन्हा रहने का हम दोनों का ये इल्म भी खूब अनूठा है

मैं जब भी उदास रहा यहीं इसी कमरे में बैठा बाहर न गया
ज़माने से पूछ लो यह कोई न कहेगा की वो तुमसे रूठा है

आरोपों की चादर मैंने समेट ली है अब तुम भी समेट लो
आ दोनों मिलकर ये भूल जाएँ कि कौन कितना झूठा है

ये घर पूरा मेरा है औ" पूरा का पूरा तुम्हारा भी है "धरम"
अब यहाँ क्या हिसाब करना कि किसने किसको लूटा है

Sunday, 18 September 2016

चंद शेर

1.
कुछ तो मिला होगा उस दोनों में तब तो बात बनी होगी
वरना बहुत वजह हैं "धरम" इस ज़माने में बात टूटने की

2.
कहीं कोई सितारा टूटा होगा जो मेरी झोली भर गई
आज मेरी बहुत आरज़ू है "धरम" खुद को लूटने की

3.
उसका किसी पे दिल आया औ" किसी और पे वफ़ा
नतीजा यह है "धरम" की तीनो के साथ हुआ ज़फ़ा

4.
उसके जनाज़े को किसी का कन्धा भी नसीब नहीं हुआ
कि मरने के बाद भी "धरम" कोई उसके क़रीब न हुआ

Thursday, 8 September 2016

नज़र आता है

एक दीवार के पीछे कई और दीवार नज़र आता है
हद-ए-निगाह तक यहाँ सब बीमार नज़र आता है

इस शहर के लोगों को क्या समझूँ कुछ समझ नहीं आता
यहाँ तो हर चौराहे पर मंदिर-औ-मीनार नज़र आता है

कि मंदिर की एक ईंट गिरी मीनार का एक शीशा टूटा
इस बात पर पूरा का पूरा शहर ख़बरदार नज़र आता है

जहाँ भी उठती है एक छोटी सी चिंगारी औ" थोड़ी सी हवा
उस मंज़र को देखने इंसानों का एक बाज़ार नज़र आता है

कि हर कोई दूसरों की मुफलिसी-औ-खुद्दारी पर हँसता है
यहाँ के लोगों में "धरम" ये कैसा आज़ार नज़र आता है

Saturday, 20 August 2016

अब तेरा यहाँ बसर नहीं

ऐ वक़्त तेरी मार भी अब मुझे मयस्सर नहीं
ऐसा लगता है मेरे कांधे पर अब मेरा सर नहीं

मुफ़लिसी का आलम औ" भूख से टूटा बदन
कि खुद की रुक गई सांस मुझे यह ख़बर नहीं

मेरी किस्मत तू चिंगारी से जलकर राख़ हो गई
कि अब यहाँ किसी की दुआ में कोई असर नहीं

जो दिन ढला तो वक़्त भी क्या कमाल कर गया
कि जो मुझको पहचाने यहाँ ऐसी कोई नज़र नहीं

अब तो यहाँ तेरा कोई दुश्मन भी न रहा "धरम"
तू चल कोई और जहाँ अब तेरा यहाँ बसर नहीं

Sunday, 14 August 2016

चंद शेर

1.

जब कज़ा ही मंजिल है "धरम" तो ये मिल ही जाएगी
यकीं मानो ये मंज़िल एक दिन खुद ही चल के आएगी