Friday, 28 October 2011

तन्हाई

अकेला हूँ, तनहा हूँ
इंसानों का मेला है
उसमे दिल अकेला है
हिज्र कि बातें मुझसे न पूछो
यहाँ कहा कोई मेला है

कल साथ चले थे चंद कदम
फिर बिछड़ गए तुम से हमदम
यादें तो केवल यादें है
मन भारी है कुछ यादों से
खुद तनहा हूँ कुछ वक्तों से


वो बातें क्या बईमानी थी
जो तुम मुझ से कुछ कहती थी
वो निगाहों का जो मिलना था
मिल कर फिर झुक जाना था
फिर उठता था नई उमंगो से
ख़ामोशी रौशन होती थी
एक बार पुनः निगाहों का मिलन
लगता था जैसे आलिंगन

तुम कहा गई कुछ पता नहीं
कोई क्या पूछे किससे पूछे
तुम आओगी तो मैं जागूँगा
मन फिर से पुलकित होगा
हर्षित होगा, खिल जायेगा
फिर साथ चलेंगे कुछ दुरी तक
जहाँ अपना आशियाँ होगा
फिर मिलकर जीवन जियेंगे

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