एक शायर था, जो कभी आशिक भी था
थोडा प्यासा भी था और दीवाना भी था
एक रोज़ मैंने देखा उसको
पुराने ख़त को नए लिफाफे में
महफूज़ कर के रख रहा था
पुरानी संदूक में, किताबों के भीतर
मैंने पूछा कि ये क्या है
जबाब में मैंने देखा कि
वह निकलता है उस लिफाफे को
कभी होठों से चूमता है
कभी आखों पे रखता है
कभी सीने से लगता है
और फिर कहीं खो जाता है
शायद किसी पुरानी यादों में
फिर मैंने उसे जगाया
तब उसने मुझे बताया
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है
यह एहसास दिलाती है
मुझको मेरी जिंदगी का
इतना कहते कहते
उसकी चौड़ी पेशानी पर
भाव के कुछ लकीर दिखाई देते हैं
जिसे मैं शायद समझ नहीं पा रहा था
की वह फिर बोल गया
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है
फिर वह आखें बंद करता है
दुबकी लगाता है पुराने यादों के समंदर में
कभी मुस्कुराता है, कभी खिलखिलाता है
कभी आपने दोनों हाथों को यूँ पकड़ता है
मानो किसी को गले लगा रहा हो
और फिर कहता है
यह ख़त मेरे महबूब की है
बात भी बहुत खूब की है
इसके आगे वह कुछ बोल न सका
मुझे लगा मैंने कर दी है खता
छेडकर इनकी पुरानी यादों को
जिसमे एक ज़ख्म था
जिसे मैं कुरेद गया था !!!!
Us shayar ke dard ko badi shiddat se mahsus kiya ja sakta hai...
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