एक टूटा पुराना रिश्ता
जिसे फिर से जोड़ा गया था
जिसके गाँठ स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
अब उस रिश्ते की गिरह भी
ढीली हो चली है
बीते हुए लम्हों की कसक भी
तमाम यादों को दफनाकर
ठंढी हो चली है
वो हवाएँ जो अपने साथ
ढेर सारी खुश्बू समेटकर लाती थी
अब इधर नहीं आती
कि उसके भी रुख अब
बदले-बदले से नज़र आते हैं
वह ख़ामोशी
जो नर्म साँसों कि गर्माहट में
कभी सुकूं देती थी
अब दर्द-ए-बेजुबाँ हो गई है
जिसे फिर से जोड़ा गया था
जिसके गाँठ स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
अब उस रिश्ते की गिरह भी
ढीली हो चली है
बीते हुए लम्हों की कसक भी
तमाम यादों को दफनाकर
ठंढी हो चली है
वो हवाएँ जो अपने साथ
ढेर सारी खुश्बू समेटकर लाती थी
अब इधर नहीं आती
कि उसके भी रुख अब
बदले-बदले से नज़र आते हैं
वह ख़ामोशी
जो नर्म साँसों कि गर्माहट में
कभी सुकूं देती थी
अब दर्द-ए-बेजुबाँ हो गई है
great poetry .. Dheer babu
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