जब भी कभी अकेले में
मैं शांत बैठा करता हूँ
ह्रदय में एक ज्वार सा उठता है
और वह विचल मन
दूर किसी सन्नाटे में खोजता है
जीवन के शास्वत सत्य को
फिर सामने घना अंधेरा छा जाता है
अन्तः मन का वह दीपक
उस घने अंधेरे को चीरकर
पढना चाहता है उस अविचल सत्य को
मगर वह निराश होकर लौट आता है
और फिर जीवन के आपा-धापी में खो जाता है
मैं शांत बैठा करता हूँ
ह्रदय में एक ज्वार सा उठता है
और वह विचल मन
दूर किसी सन्नाटे में खोजता है
जीवन के शास्वत सत्य को
फिर सामने घना अंधेरा छा जाता है
अन्तः मन का वह दीपक
उस घने अंधेरे को चीरकर
पढना चाहता है उस अविचल सत्य को
मगर वह निराश होकर लौट आता है
और फिर जीवन के आपा-धापी में खो जाता है
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