औरों के शिकस्त पर मुस्कुराना ठीक नहीं
खुद अपनी शिकस्त पर रोना भी ठीक नहीं
जिंदगी है, यह बहुत कुछ दिखाती है
यह कर्म भूमि भी यह धर्म भूमि भी
यह कर्त्तव्य भूमि भी यह रणभूमि भी
यहाँ रिश्ते बनते भी है टूटते भी हैं
कुछ रिश्ते गांठ के सहारे चलते भी हैं
अर्थ के नींब पर टिके रिश्ते
जरा सी चूक पर बिखर जाते हैं
कुछ ठिठुरते रिश्ते कुछ उबलते रिश्ते
मानो शर्द भी गर्म भी और हवा भी
मन यूँ उलझता है कि अब क्या करें
प्रेम की परिभाषा भी कुछ बदल सी गई है
जैसे मानो की प्रेम कोई व्यापार हो
आह!अगर प्रेम निःस्वार्थ और निश्छल हो
तो जीवन सुखी भी और सफल भी हो
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