Monday, 27 January 2014

ज़िंदगी की दुहाई न दो

मुझे तुम ज़िंदगी की दुहाई न दो
बेसबब फिर से मुझे रुस्वाई न दो

मैं तन्हा हूँ अच्छा हूँ ठीक भी हूँ
मुझे फिर से नज़र-ए-बेवफाई न दो

ये अंज़ाम मोहब्बत का है मैं क़ुबूल करता हूँ
मगर तुम सर-ए-आम मुझे जगहसाई न दो

जो धड़के दिल मेरा उसके प्यार में कभी
ऐ खुदा ! मुझे फिर से ये खुदाई न दो

दिल का मसला था जाँ बार-बार अटक जाती थी
मैं भूल गया हूँ "धरम" मुझे फिर से वो रुलाई न दो

Saturday, 25 January 2014

बीमारू रिश्ते का चलन

अटूट,निष्कपट तथा निस्छल रिश्ते को छोड़
दुनियाँ बीमारू रिश्ते की ओर लगा रही है दौड़

हर जगह यह फ़ैल चुका है घुलकर पर्यावरण में
कार्यालय में,आँगन में,घर में और अन्तःकरण में

रिश्ते की बीमारी कहाँ कभी होती है सिर्फ एक
जुड़ने का डोर होता है एक मगर टूटने के होते अनेक

जो लग गया है रिश्ते को कहीं अब क्षय रोग
बिना इलाज़ किये रिश्ते बदल लेते हैं लोग

जब कभी अकेले में बैठकर सिसकता है रिश्ता
हरेक जोड़ से टूटता है और बस बिलखता है रिश्ता

देखकर फायदे की बात लोग देते हैं मित्रता की दुहाई
जो निकल गया मतलब तो बस हो जाते हैं हरज़ाई

लग गया है रिश्ते को बीमारी तो कैंसर भी अब छोटा लगता है
क्यूँ करें अपनी गलती का एहसास सबको यह खोटा लगता है

नोचकर रिश्ते का अपनापन लेकर अब उड़ गया है गिद्ध
भला बिना अपनापन के भी कोई रिश्ता होता है शुद्ध

दौलतमंद लोग फेंककर पैसा रिश्ते खरीद लाते बाज़ार से
बताते हैं ये आवाम को ख़ुशी-ख़ुशी सूचना देकर अख़बार से

Saturday, 18 January 2014

लुट गए ज़माने में

हमने कहाँ कुछ तामीर किया ज़माने के लिए
लोग बनवाते हैं बुतखाने अपने दीवाने के लिए

बाँट कर प्यार मुफ्त में तुम तो खुद को लुटाते रहे
मिले तो गैरों से मगर उन्हें तुम अपना बताते रहे

दर्द लिए मरहम किये तो रुस्वा हो गए बीमारखाने में  
ज़माने भर का दीदार किए तुम अपने गरीबखाने में

कभी अजब इश्क़ हुआ था यहीं इसी मयखाने में
बाद उसके कुछ यूँ हुआ हम आने लगे बेगाने में

पुरानी रंजिश को छोड़कर जो हम फिर से आए ज़माने में
लोगों ने हमको लूट लिया "धरम" खुद अपने इमामखाने में  


 

Saturday, 11 January 2014

चंद शेर

1.
जब कुछ न बन सका तो सर-ए-आम तमाशा बना दिया
ज़िस्म तो पड़ा रहने दिया हाँ दिल का दरबाजा बना दिया

2.
जो मिले थे हम कभी वह तो बस अब एक किस्सा है
जो प्यार था अब वह दिल का टूटा हुआ एक हिस्सा है

ज़िस्म तो होते थे दो मगर रूह बस एक हुआ करता था
हज़ारों मतभेद तो थे हाँ मगर एक वफ़ा हुआ करता था

मुद्दतों पुरानी बातें भी लगता था जैसे कल ही गुजरा हो
वक़्त भी कुछ यूँ ही गुजरता जैसे अपने लिए ही ठहरा हो

Thursday, 9 January 2014

दवा-ए-ज़ख्म-ए-दिल

बढाकर हाथ अपना मैंने दुःख का दामन थामा है
खुद से ही लगाकर छुरी मैंने ज़ख्म-ए-दिल पाया है

तुम ज़हर न घोलो मेरे लहू में ऐ नामुराद आशिक़
ज़माने वालों ने तो इसे मुझपर बे-असर पाया है

कौन सी यारी कैसी दोस्ती कैसा प्यार कैसी आशिक़ी
हर लम्हा अब तो मैंने खुद को इससे बे-खबर पाया है

बाज़ार-ए-इश्क़ में इत्तफ़ाक़न हम मिले तो क्या मिले
न रूककर एहतराम पाया है न झुककर सलाम पाया है

अब तो मुझे किसी औऱ की कोई ज़रूरत भी नहीं "धरम"
खुद से ही दवा-ए-दर्द पाया है खुद ही से दर्दे-बे-दवा पाया है