Tuesday, 15 July 2014

लब पे ताला पड़ गया

ज़रा सी बात थी मगर रंग गहरा पड़ गया
दिल टूटा ही था की ज़ख्म गहरा पड़ गया

अब तो कोई राज़ दफ़न भी नहीं है सीने में
दिल में झांक कर देखा जिस्म ठंढा पड़ गया

हसरत भरी निगाह भी अब काम नहीं आती
जो उतरा दरिया-ए-इश्क़ में तो सूखा पड़ गया

जब से मेरी ज़िंदगी का आफताब बे-वक़्त डूबा है
चौदवीं के महताब का भी रंग काला पड़ गया

इस शहर में अब तो हर कोई मुझसे खफ़ा है "धरम"
जो पूछा हाल-ए-दिल तो लब पे ताला पड़ गया 

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