Thursday, 31 July 2014

मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा

मैं तो मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा
तेरे जिस्म से लेकर तेरी जाँ तक जाऊंगा

मेरे दिल में मिलन-ए-नज़र-ए-चिराग जल चुका है
तेरे इंतज़ार में ज़ीस्त के अंतिम ख़िज़ाँ तक जाऊंगा

ये मोहब्बत! है इसमें बे-सबब रुस्वाई तो होती ही है
तुझको पाने मैं तेरे अंतिम नक्श-ए-पाँ तक जाऊंगा

बिन तेरे मेरी ज़िंदगी बस एक तन्हाई की रात है "धरम"
रौशन-ए-ज़ीस्त के लिए हद-ए-सितम-ए-दौराँ तक जाऊंगा 

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