Sunday, 7 June 2015

अनकहे शब्द औ" मचलते ख्वाब

कुछ अनकहे शब्द
जज़्बात से अब भी दबे हैं
दिल में उफान उठ रहा है
स्वांस का प्रवाह सामान्य नहीं
कदम कभी छोटे तो कभी बड़े
मगर बातें जुबाँ पर नहीं आ रही
बस एक हिचकिचाहट है

कुछ मचलते ख्वाब हैं
कभी समंदर से हिलोरे मारते
कभी आसमाँ में स्वच्छंद उड़ान
कभी घर के दरवाजे पर चुपके से दस्तक देते
बस मुस्कुरा कर रह जाते
नज़र झुकाते चल देते मुझसे दूर
उस मुस्कराहट को मुझे अब पढ़ना नहीं आता
वक़्त ने समझदारी की सारी बारीकियां ख़त्म कर दी
अब ये सारे ख्वाब दिल पर बस बोझ हैं

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