धीरे-धीरे मुझे ये यकीं हो चला था की उसका रूह अब उसके ज़िस्म से अलग हो चुका है| रूह के बगैर ज़िस्म महज़ एक पत्थर है सिर्फ पत्थर| ये बात ज़्यादा पुरानी नहीं है| मैंने ख़ुद उसके भटकते रूह को उसके ज़िस्म में पूरी सिद्दत से पिरोया था| एक स्नेह भरा स्पर्श उसके पूरे ज़िस्म में सिहरन पैदा कर देता था| वह मूक सिहरन संवेदनाओं के सारे रंग समेटे इशारे में मुझे यह कहती थी कि ये लो मैं तुझे अब आईना दिखा रही हूँ, मेरे ज़िस्म में पिरोए इस रूह में तुम ख़ुद अपनी शक़्ल देखो| मैं भी मुस्कुरा देता था और बात इशारों में ही पूरी हो जाती थी| हम दोनों के बीच रूह से सिंचित संवेदना एक-दूसरे के लिए एक प्रश्न भी था एक उत्तर भी|
उसके रूह से मेरे रूह ने अनगिनत संवाद किए जो मेरे मानसपटल में अब भी क़ैद हैं| तब मुझे पूरा यकीं था की ये दो रूह सिर्फ इसलिए अलग हैं की ये दो अलग-अलग ज़िस्म से ताल्लुक़ रखते हैं| जब दोनों ज़िस्म का एकाकार हुआ तो यह निर्णय कर पाना मुश्किल हो गया कि किस रूह का ताल्लुक़ किस ज़िस्म से है| उसके बाद मेरा यकीं उस विश्वास को प्राप्त हुआ जहाँ यह निर्णय कर पाना बिल्कुल ही कठिन हो गया कि ख़ुद मैं किस ज़िस्म से ताल्लुक़ रखता हूँ| मैं ख़ुद को दोनों ज़िस्म में एक ही सा पाता था| मैंने तब ख़ुद पढ़ा था उसके रूह में उपजे ढेर सारे यक्ष प्रश्न : की अब बताओ कि ये रिश्ता क्या है? यदि ये शुरुवात है तो इसका अंत क्या है? और यदि यही अंत है तो शुरू कहाँ से हुआ था, क्यूँ हुआ था, किसने किया था, किसलिए किया था, कब किया था? इस रिश्ते रूपी डोर को मैं जिस नाम से पकड़ी हूँ क्या तुम भी इसे वही समझते हो या कुछ और? मेरा मौन रुपी अभिव्यक्ति ऐसे जटिल प्रश्नों का उत्तर बिल्कुल नहीं था| मगर मैंने इशारे की अभिव्यक्ति से उसके सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया था| उसको यह उत्तर पसंद नहीं था क्यूंकि उसको उत्तर में मुझसे कुछ शब्द चाहिए थे जो मैं कह नहीं सकता था| क्यूंकि मेरे लब कभी भी आज़ाद न थे| मेरे मौन को उसकी चीख़ जिसमे इतने सारे प्रश्न छुपे थे तोड़ नहीं पाता था| उसके बाद धीरे-धीरे उसके रूह ने मुझसे प्रश्न करना बंद कर दिया था| इशारे की अभिव्यक्ति और बोली की अविव्यक्ति में क्या इतना फ़र्क होता है? क्या मेरा इशारा उत्तरहीन था? नहीं, बिल्कुल नहीं|
फिर क्या था रूह अलग हुए| उसके जिस भटकते रूह को मैंने उसके ज़िस्म में पिरोया था उसमें फिर कभी मुझे अपनी शक़्ल दिखाई नहीं देता था| जब भी झांकता पता नहीं क्यूँ कुछ धुंध सा नज़र आता था जहाँ रूह और ज़िस्म दोनों अलग-अलग जगह तैर रहे होते थे| मैं उसके बाद भी झांकता रहा, झांकता रहा बस धुंध ही था हाँ मगर उसके भटकते रूह को कोई और ज़िस्म मिल गया था जिस ज़िस्म के सहारे ये ख़ुद अपना ज़िस्म तौल लेती थी| मेरे लिए अब भी वहां धुंध है सिर्फ धुंध| मगर हाँ! अब यक़ीनन उसका रूह उसके ज़िस्म से अलग हो गया है|
उसके रूह से मेरे रूह ने अनगिनत संवाद किए जो मेरे मानसपटल में अब भी क़ैद हैं| तब मुझे पूरा यकीं था की ये दो रूह सिर्फ इसलिए अलग हैं की ये दो अलग-अलग ज़िस्म से ताल्लुक़ रखते हैं| जब दोनों ज़िस्म का एकाकार हुआ तो यह निर्णय कर पाना मुश्किल हो गया कि किस रूह का ताल्लुक़ किस ज़िस्म से है| उसके बाद मेरा यकीं उस विश्वास को प्राप्त हुआ जहाँ यह निर्णय कर पाना बिल्कुल ही कठिन हो गया कि ख़ुद मैं किस ज़िस्म से ताल्लुक़ रखता हूँ| मैं ख़ुद को दोनों ज़िस्म में एक ही सा पाता था| मैंने तब ख़ुद पढ़ा था उसके रूह में उपजे ढेर सारे यक्ष प्रश्न : की अब बताओ कि ये रिश्ता क्या है? यदि ये शुरुवात है तो इसका अंत क्या है? और यदि यही अंत है तो शुरू कहाँ से हुआ था, क्यूँ हुआ था, किसने किया था, किसलिए किया था, कब किया था? इस रिश्ते रूपी डोर को मैं जिस नाम से पकड़ी हूँ क्या तुम भी इसे वही समझते हो या कुछ और? मेरा मौन रुपी अभिव्यक्ति ऐसे जटिल प्रश्नों का उत्तर बिल्कुल नहीं था| मगर मैंने इशारे की अभिव्यक्ति से उसके सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया था| उसको यह उत्तर पसंद नहीं था क्यूंकि उसको उत्तर में मुझसे कुछ शब्द चाहिए थे जो मैं कह नहीं सकता था| क्यूंकि मेरे लब कभी भी आज़ाद न थे| मेरे मौन को उसकी चीख़ जिसमे इतने सारे प्रश्न छुपे थे तोड़ नहीं पाता था| उसके बाद धीरे-धीरे उसके रूह ने मुझसे प्रश्न करना बंद कर दिया था| इशारे की अभिव्यक्ति और बोली की अविव्यक्ति में क्या इतना फ़र्क होता है? क्या मेरा इशारा उत्तरहीन था? नहीं, बिल्कुल नहीं|
फिर क्या था रूह अलग हुए| उसके जिस भटकते रूह को मैंने उसके ज़िस्म में पिरोया था उसमें फिर कभी मुझे अपनी शक़्ल दिखाई नहीं देता था| जब भी झांकता पता नहीं क्यूँ कुछ धुंध सा नज़र आता था जहाँ रूह और ज़िस्म दोनों अलग-अलग जगह तैर रहे होते थे| मैं उसके बाद भी झांकता रहा, झांकता रहा बस धुंध ही था हाँ मगर उसके भटकते रूह को कोई और ज़िस्म मिल गया था जिस ज़िस्म के सहारे ये ख़ुद अपना ज़िस्म तौल लेती थी| मेरे लिए अब भी वहां धुंध है सिर्फ धुंध| मगर हाँ! अब यक़ीनन उसका रूह उसके ज़िस्म से अलग हो गया है|