Wednesday, 30 August 2017

उसका रूह और ज़िस्म

धीरे-धीरे मुझे ये यकीं हो चला था की उसका रूह अब उसके ज़िस्म से अलग हो चुका है| रूह के बगैर ज़िस्म महज़ एक पत्थर है सिर्फ पत्थर| ये बात ज़्यादा पुरानी नहीं है| मैंने ख़ुद उसके भटकते रूह को उसके ज़िस्म में पूरी सिद्दत से पिरोया था| एक स्नेह भरा स्पर्श उसके पूरे ज़िस्म में सिहरन पैदा कर देता था| वह मूक सिहरन संवेदनाओं के सारे रंग समेटे इशारे में मुझे यह कहती थी कि ये लो मैं तुझे अब आईना दिखा रही हूँ, मेरे ज़िस्म में पिरोए इस रूह में तुम ख़ुद अपनी शक़्ल देखो| मैं भी मुस्कुरा देता था और बात इशारों में ही पूरी हो जाती थी| हम दोनों के बीच रूह से सिंचित संवेदना एक-दूसरे के लिए एक प्रश्न भी था एक उत्तर भी|

उसके रूह से मेरे रूह ने अनगिनत संवाद किए जो मेरे मानसपटल में अब भी क़ैद हैं| तब मुझे पूरा यकीं था की ये दो रूह सिर्फ इसलिए अलग हैं की ये दो अलग-अलग ज़िस्म से ताल्लुक़ रखते हैं| जब दोनों ज़िस्म का एकाकार हुआ तो यह निर्णय कर पाना मुश्किल हो गया कि किस रूह का ताल्लुक़ किस ज़िस्म से है| उसके बाद मेरा यकीं उस विश्वास को प्राप्त हुआ जहाँ यह निर्णय कर पाना बिल्कुल ही कठिन हो गया कि ख़ुद मैं किस ज़िस्म से ताल्लुक़ रखता हूँ| मैं ख़ुद को दोनों ज़िस्म में एक ही सा पाता था| मैंने तब ख़ुद पढ़ा था उसके रूह में उपजे ढेर सारे यक्ष प्रश्न : की अब बताओ कि ये रिश्ता क्या है? यदि ये शुरुवात है तो इसका अंत क्या है? और यदि यही अंत है तो शुरू कहाँ से हुआ था, क्यूँ हुआ था, किसने किया था, किसलिए किया था, कब किया था? इस रिश्ते रूपी डोर को मैं जिस नाम से पकड़ी हूँ क्या तुम भी इसे वही समझते हो या कुछ और? मेरा मौन रुपी अभिव्यक्ति ऐसे जटिल प्रश्नों का उत्तर बिल्कुल नहीं था| मगर मैंने इशारे की अभिव्यक्ति से उसके सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया था| उसको यह उत्तर पसंद नहीं था क्यूंकि उसको उत्तर में मुझसे कुछ शब्द चाहिए थे जो मैं कह नहीं सकता था| क्यूंकि मेरे लब कभी भी आज़ाद न थे| मेरे मौन को उसकी चीख़ जिसमे इतने सारे प्रश्न छुपे थे तोड़ नहीं पाता था| उसके बाद धीरे-धीरे उसके रूह ने मुझसे प्रश्न करना बंद कर दिया था| इशारे की अभिव्यक्ति और बोली की अविव्यक्ति में क्या इतना फ़र्क होता है? क्या मेरा इशारा उत्तरहीन था? नहीं, बिल्कुल नहीं|

फिर क्या था रूह अलग हुए| उसके जिस भटकते रूह को मैंने उसके ज़िस्म में पिरोया था उसमें फिर कभी मुझे अपनी शक़्ल दिखाई नहीं देता था| जब भी झांकता पता नहीं क्यूँ कुछ धुंध सा नज़र आता था जहाँ रूह और ज़िस्म दोनों अलग-अलग जगह तैर रहे होते थे| मैं उसके बाद भी झांकता रहा, झांकता रहा बस धुंध ही था हाँ मगर उसके भटकते रूह को कोई और ज़िस्म मिल गया था जिस ज़िस्म के सहारे ये ख़ुद अपना ज़िस्म तौल लेती थी| मेरे लिए अब भी वहां धुंध है सिर्फ धुंध| मगर हाँ! अब यक़ीनन उसका रूह उसके ज़िस्म से अलग हो गया है|

Sunday, 27 August 2017

चंद शेर

1.
किस ख़्याल से दिल खुश होगा चेहरे पर निखार आएगा
अब पता नहीं 'धरम' कि कैसे मुझे खुद पर प्यार आएगा

2.
खुद से खुद ही रूठे "धरम" फिर खुद मना भी लिए
कि खुद ही अपना दिल बुझाये औ" जला भी लिए

3.
ऐ! ज़िंदगी अब जो हम इस दौर से निकलेंगे तो कहाँ जाएंगे
अब तू ही बता "धरम" कि ग़म के अलावा और क्या खाएंगे

4.
मेरी फ़ितरत में "धरम" कभी दूसरों का दिल दुखाना नहीं है
आपको तालीम हासिल है आप जाएंगे दिल दुखाकर जाएंगे

5.
'धरम' क्यूँ ये चीख सुनाई नहीं देती क्यूँ ये ज़ख्म दिखाई नहीं देता
क्यूँ कोई ख़्वाब सुनाया नहीं जाता क्यूँ कोई गीत गाया नहीं जाता

6.
संवेदनाओं को घूंट के सहारे हलक़ से नीचे उतारना पड़ता है
क्यूँकर हरेक एहसास के बाद 'धरम' मेरा गला सूख जाता है

Friday, 18 August 2017

चंद शेर

1.
कि उम्मीद से ऊँची मेरे ख़्वाब की मंज़िल न थी हाँ! मगर रास्ता लम्बा जरूर था
मैं भी क्या करता "धरम" खुद ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने के लिए मज़बूर था

2.
कि तेरे लिए 'धरम' महज़ एक ही ज़ाम के लायक था मैं
और क्या कहें कि सिर्क एक ही सलाम के लायक था मैं

3.
कैसे कह दूँ "धरम" कि चिराग हर शख़्स के दिल में जलता होगा
ग़र जलता भी होगा तो जरूरी नहीं कि हर पत्थर पिघलता होगा

4.
ऐ! ज़िंदगी ग़र तुझे कब्र भी कहूं तो दो गज़ ज़मीं देनी होगी
कि इतनी ज़मीं भी "धरम" मुझे किसी और से ही लेनी होगी

5.
कि वो कैसा ख़्वाब था 'धरम' ऊपर ज़मीँ थी नीचे आसमाँ था
गुज़रा ज़माना था झूठी मोहब्बत थी औ" उजड़ा आशियाँ था

6.
हर बार प्रमाणित करने का दाईत्व 'धरम' मेरा रहता है
कि मैं ऐसा दीपक हूँ जिसके तले हमेशा अँधेरा रहता है

7.
कि नुमाइंदे हुस्न के कितने आए "धरम" कितने चले भी गए
तू बता हुस्न कहाँ किसी के पहलू में देर तलक ज़िंदा रहता है

8.
बाद तेरे न कभी मेरी ज़ुबाँ खुली न किसी पर प्यार आया
दिल में उदासी छाई "धरम" हर गुलसन पर ग़ुबार आया

9.
महज़ एक ही सैलाब आया औ" हम दरिया-ए-दर्द में डूब गए
और बहुत सितम होना है 'धरम' क्यूँकर पहले में ही ऊब गए

Thursday, 10 August 2017

असर ढूँढ़ता है

क्यूँ यहाँ परिंदा खुद अपना पर ढूँढ़ता है
जो मेरे साथ है वो भी हमसफ़र ढूँढ़ता है

कल तो मेरे लुटने की ख़बर मिल गई थी
अब ये बता की तू कौन सी ख़बर ढूँढ़ता है

कि यही है तेरे बुलंदी औ" मेरे ग़र्क की मंज़िल
अब तू ये बता कि यहाँ कौन सा डगर ढूँढ़ता है

तेरे बाहों की ठंढक में हर दिल पत्थर हो जाता है
हर कोई तेरे पहलू में आकर दूसरा बसर ढूँढ़ता है

जो मिली है तुझको "धरम" तेरे कर्मों का फल ही है
इसमें तू क्यूँ किसी बद-दुवा का कोई असर ढूँढ़ता है

Tuesday, 8 August 2017

चंद शेर

1.
तुम तो मुफ़लिस हो तुम्हारे हौसले को बुलंदी नसीब नहीं
उसे जाने दे ज़िद न कर 'धरम' कि वो अब तेरे क़रीब नहीं

2.
ख्वाईश की सीढ़ी चाहत की मंज़िल औ" बाद उसके खुला आसमाँ
"धरम" बुलंदी वालों को क्यूँ कर वहां से दिखता है दोज़ख ये ज़हाँ

3.
मेरे घऱ के दर-ओ-दीवार भी "धरम" अब मुझसे उकताने लगे हैं
कि जिनके कल हम अज़ीज़ थे आज वो भी चेहरा छुपाने लगे हैं

4.
क्यूँ ये गुनाह-ए-अज़ीम "धरम" मेरे ही हाथों होना था
कि जिससे खुदा ने मिलाया था उसे खुद ही खोना था

5.
जो ठहर के गुज़री है "धरम" वो तेरी याद नहीं हो सकती
कि जो बात मुझको ख़ुशी दे वो तेरी बात नहीं हो सकती

6.
वहां हम क्यूँ उम्मीद रखते हैं दिल से दिल मिलाने का
जहाँ से कोई भी रास्ता "धरम" नहीं जाता मयख़ाने का

7.
हम उल्फ़त के सौदागर हैं हमें तुझ जैसे हुस्न-ए-बेपर्दा से क्या
तू तो एक बीमारी है "धरम" तुझे इस ज़हाँ के दीनदारी से क्या

8.
थोड़े आँवलें दिल में भी हैं "धरम" थोड़ी जलने की बू पाँव तले भी है
कि थोड़ी ज़मीं आसमाँ से ऊपर भी है थोड़ा आसमाँ ज़मीं तले भी है

9.
कि कुछ ज़ख्म दिखाई नहीं देते तो कुछ दर्द सुनाया नहीं जाता
मैं तो अब वो गीत हूँ "धरम" जिसे कभी गुनगुनाया नहीं जाता



Friday, 4 August 2017

चंद शेर

1.
वो कौन सी दीवार थी "धरम" न जाने कब गिरा दी गई
कि मारे शर्म से अपने काँधे से अपनी गर्दन हटा दी गई

2.
मैं तुमसे जितना मिला उससे ज़्यादा और किसी से क्या मिलता
कि ख़ुशी तेरे दामन में आती थी "धरम" और चेहरा मेरा खिलता

3.
वो था मेरा ज़ुर्म-ए-उल्फ़त मुझको मिली है ये सज़ा-ए-मोहब्बत
जो लिखा था वो कुछ और था "धरम" अब यही है तेरी किस्मत

4.
तेर हर अगला ज़ख्म "धरम" पिछले सारे ज़ख्मों पर भारी होता है
कि ऐ! ढलता हुस्न अब ये बता तुझपर कौन सा नशा तारी होता है

5.
गुज़रे वक़्त की मिशाल है कि जो तुझसे मिला वो बेहाल है
मैं तुझसे बच कैसे गया "धरम" ये तेरे लिए एक सवाल है