Friday, 18 August 2017

चंद शेर

1.
कि उम्मीद से ऊँची मेरे ख़्वाब की मंज़िल न थी हाँ! मगर रास्ता लम्बा जरूर था
मैं भी क्या करता "धरम" खुद ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने के लिए मज़बूर था

2.
कि तेरे लिए 'धरम' महज़ एक ही ज़ाम के लायक था मैं
और क्या कहें कि सिर्क एक ही सलाम के लायक था मैं

3.
कैसे कह दूँ "धरम" कि चिराग हर शख़्स के दिल में जलता होगा
ग़र जलता भी होगा तो जरूरी नहीं कि हर पत्थर पिघलता होगा

4.
ऐ! ज़िंदगी ग़र तुझे कब्र भी कहूं तो दो गज़ ज़मीं देनी होगी
कि इतनी ज़मीं भी "धरम" मुझे किसी और से ही लेनी होगी

5.
कि वो कैसा ख़्वाब था 'धरम' ऊपर ज़मीँ थी नीचे आसमाँ था
गुज़रा ज़माना था झूठी मोहब्बत थी औ" उजड़ा आशियाँ था

6.
हर बार प्रमाणित करने का दाईत्व 'धरम' मेरा रहता है
कि मैं ऐसा दीपक हूँ जिसके तले हमेशा अँधेरा रहता है

7.
कि नुमाइंदे हुस्न के कितने आए "धरम" कितने चले भी गए
तू बता हुस्न कहाँ किसी के पहलू में देर तलक ज़िंदा रहता है

8.
बाद तेरे न कभी मेरी ज़ुबाँ खुली न किसी पर प्यार आया
दिल में उदासी छाई "धरम" हर गुलसन पर ग़ुबार आया

9.
महज़ एक ही सैलाब आया औ" हम दरिया-ए-दर्द में डूब गए
और बहुत सितम होना है 'धरम' क्यूँकर पहले में ही ऊब गए

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