Friday, 4 August 2017

चंद शेर

1.
वो कौन सी दीवार थी "धरम" न जाने कब गिरा दी गई
कि मारे शर्म से अपने काँधे से अपनी गर्दन हटा दी गई

2.
मैं तुमसे जितना मिला उससे ज़्यादा और किसी से क्या मिलता
कि ख़ुशी तेरे दामन में आती थी "धरम" और चेहरा मेरा खिलता

3.
वो था मेरा ज़ुर्म-ए-उल्फ़त मुझको मिली है ये सज़ा-ए-मोहब्बत
जो लिखा था वो कुछ और था "धरम" अब यही है तेरी किस्मत

4.
तेर हर अगला ज़ख्म "धरम" पिछले सारे ज़ख्मों पर भारी होता है
कि ऐ! ढलता हुस्न अब ये बता तुझपर कौन सा नशा तारी होता है

5.
गुज़रे वक़्त की मिशाल है कि जो तुझसे मिला वो बेहाल है
मैं तुझसे बच कैसे गया "धरम" ये तेरे लिए एक सवाल है 

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