Saturday, 23 September 2017

चंद शेर

1.
जिस जहाँ के तुम खरीददार थे वहाँ तो हम बिक न सके
किसी और दूसरे ज़हाँ में 'धरम' मुझे बिकना गँवारा नहीं

2.
आज जरा हौशले से सुनो मुझे 'धरम' कि हाँ महज़ एक चीख ही हूँ मैं
मैं भूला नहीं हूँ कि तेरे दामन को मिला एक अनचाही भीख ही हूँ मैं

3.
कि ख़ुद मेरे ही घर में "धरम" कितनी वीरानी लगी मुझे
जब सोचने लगा तो तेरी सारी बातें आसमानी लगी मुझे

4.
कोई और वादा नहीं चाहिए तेरे इस वादा-ए-सुखन के बाद
कि अब कोई जहाँ नहीं चाहिए "धरम" इस कफ़न के बाद

5.
बाद तेरे नाम के "धरम" मैंने जो भी लिखा वो इबादत है
कि ये कुछ और नहीं हर हर्फ़ में लिपटी तेरी मोहब्बत है

Thursday, 21 September 2017

हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे

कि जो खुली किताब तो हर होंठ गुनगुनाने लगे मुझे
एक के बाद एक मेरे सारे दुश्मन अपनाने लगे मुझे

कि बात हवा के रुख़ की थी तो मैं भी साथ हो लिया
बाद इसके न जाने क्यूँकर लोग समझाने लगे मुझे

कि सिवा एक मेरे इश्क़ के तू किसी और की मुरीद नहीं
तेरी महफ़िल में इस बात पर लोग झुठलाने लगे मुझे

कि बाद तेरे जाने के भी वहाँ महफ़िल-ए-जॉ बाकी थी
न जाने क्यूँ लोग मुझको रोककर ये बतलाने लगे मुझे

उस मोहब्बत की कीमत 'धरम' मैं अब और क्या बताऊँ
तन्हाई से लिपटकर रोने में भी कितने हर्ज़ाने लगे मुझे

Thursday, 14 September 2017

चंद शेर

1.
कि जब वक़्त ने तोड़ी थी चुप्पी मेरे दिल में सिर्फ तन्हाई थी
मोहब्बत में मैं वहां रुक गया "धरम" बाद जिसके रुस्वाई थी

2.
अपने ज़ख्म-ए-दिल का 'धरम' ये मंज़र तो देखो
किस अंदाज़ से सीने में चुभा है ये खंज़र तो देखो

3.
कि किस ख़्याल को दिल में रखूं किसको निकाल दूँ
जी तो करता है 'धरम' कि खुद अपना दिल हलाल दूँ

4.
ज़ख्मों को अभी और सर होना है कि और भी दुखते-जिगर होना है
जो ख्वाब कभी देखा ना था 'धरम' हक़ीक़त ही उसका क़हर होना है

Friday, 1 September 2017

चंद शेर

1.
खुद से खुद ही रूठे 'धरम' फिर खुद मना भी लिए
कि खुद ही अपना दिल बुझाये औ" जला भी लिए

2.
वक़्त बदला फ़ासला बढ़ा औ" बूढ़ी हो गई राह तकती आखें
क्या कहें "धरम" ज़माने में किस-किस को भुलाना पड़ता है

3.
हर किसी को 'धरम' आसमाँ से इस ज़मीं पर आना पड़ता है
कि ख़ुद ही अपना दिल निकालकर उसे दफ़नाना पड़ता है

4.
तेरे बज़्म में रुस्वा होने के बाद ही 'धरम' मुझे सुकूँ मिलता है
क्या कहें कि मौत के बाद ही ज़िंदगी जीने का जुनूँ मिलता है

अतीत का रिश्ता

अतीत एक भोगा हुआ सत्य होता है जिसे भुला पाना मुझ जिसे लोगों के लिए बहुत कठिन है| मुझे तो अतीत का भोगा हुआ दुःख भी भविष्य में आने वाले किसी भी सुख के कल्पना से ज्यादा आनंद देता है| तुमको अभी मैं अपना वर्तमान तो नहीं कह सकता हाँ मेरा एक अतीत जरूर हो तुम| एक ऐसा अतीत जिसमें मुझे सुख और दुःख दोनों की अनुभूति हुई| तुम्हारे साथ बिताये हुए सुख के पल यदि रोमांचित करते हैं तो दुःख के पल भी आनंद ही देते हैं| इस पर मैं एक शेर कुछ इस तरह कहना चाहता हूँ:

                                        तेरे पहलू में जो बीते मेरे पल हैं मेरे लिए अनमोल
                                       ये लो तेरे सामने राज दिया मैं अपने दिल का खोल

तुम भविष्य के तरफ जिस अंदाज़ से देखती हो मैं ठीक उसी अंदाज़ में अतीत की तरफ देखता हूँ| मेरी नज़र में मेरे अतीत की शुरुवात और तुम्हारे भविष्य का अंतविंदु एक ही है| तो फिर हमारे जिस्म के दरम्याँ वर्तमान में इतनी दूरी क्यूँ है? हमारे रूह के दरम्याँ इतना सन्नाटा क्यूँ है? हमारे साँसों के दरम्याँ इतनी ठंढी क्यूँ है? तुम से रुख़्सत के वक़्त मैंने अतीत से जुड़े रिश्ते का एक धागा बुना था| उस धागे के एक सिरे को मैं अब भी पकड़ा हूँ और दूसरा सिरा तेरे इंतज़ार में अब भी सज़दे में झुका है| ग़र तुम भूल गई वो वाक़्या तो लो मैं तुम्हें याद दिला देता हूँ

                       मैंने तो तुझसे रुख़्सत के वक़्त अतीत को वर्तमान से जोड़ना चाहा था
                        मगर पता नहीं क्यूँ तुम्हारे दिल में मेरे लिए सिर्फ फैला सन्नाटा था

तुम्हारे लिए अतीत से वर्तमान में आकर भविष्य में झांकना, खो जाना बहुत आसान प्रतीत होता है| क्या अतीत का प्रेम ऐसे मर सकता है? यदि हाँ तो वो प्रेम नहीं महज एक छलावा है| और यदि नहीं तो क्यूँ तुम्हारे आखों के अश्क़ सूख गए? लब ख़ामोश हो गए? जिस्म रूह विहीन हो गए? संवेदनाओं में कोई कराह नहीं? आवाज़ में कोई आह नहीं? इशारों में कोई आहट नहीं? मौन में कोई चीत्कार नहीं? सन्नाटे में कोई शोर नहीं? तुम्हें यकीं न हो तो न हो मगर मैं तुम्हारे रूह को हर वक़्त ढूंढता हूँ:

                                       तेरे रूह की खोज में मैं खुद ही कहीं खो रहा हूँ            
                                     ये लो तुम्हारे ही बनाये कब्र में अब मैं सो रहा हूँ    

तुम्हारे सुनहरे भविष्य की सबसे छोटी कूद भी अतीत के सबसे ऊँची दीवार से भी ऊँची होती है| इसलिए कोई भी अतीत तुम्हारे भविष्य का रोड़ा नहीं बन सकता| तुमने अतीत की कई ऐसी दीवारें लाँघी हैं| खूब इल्म है तुमको ऐसे कूदने का|

                               लाँघो हर प्रेम की दीवार कि तेरे लिए तो हैं आसमाँ हज़ार
                              तुम क्यूँ कर याद करो उस अतीत को जो रिश्ता था बीमार
                               बाहों की वो कैची होती थी और होती थीं अपनी आँखें चार
                               जब प्रेम ही था झूठा तो अब क्यूँकर इसपर करना विचार

मुझे अब भी मेरा हर अतीत प्यारा है| तुम भी याद करो, अपने सीने में अपना दिल रखो, रूह को स्पर्श करो, शायद कुछ याद आ जाए| हाँ जब भी तुम ऐसा करना, अपनी आखें बंद रखना| खुली आखों से तुम्हें अतीत में तो सिर्फ ग़ुबार ही दिखता है| उस अतीत को याद कर तुम्हारी स्मृति में ये शेर:

                            क्यूँ मैं अब भी अतीत के झूले में झूल रहा हूँ इसका मुझे पता नहीं
                           किसी अतीत का इतना व्यसन भी किसी के लिए होता अच्छा नहीं