1.
महज़ एक ही ज़िंदगी में कितने और ज़िंदगी निकल जाते हैं
आँखें बंद ही रह जाती हैं "धरम" ख़्वाब सारे निकल जाते हैं
2.
जब कभी "धरम" ख़्वाब में क़ातिल के शक्ल में मसीहा आए
मेरी बाहों में तेरी बाहें आए तस्सबुर में सिर्फ तेरा चेहरा आए
3.
कि जहाँ कुछ भी नहीं होता वहां मेरा ज़माना होता है
वहां के हरेक सन्नाटे से "धरम" मेरा फ़साना होता है
4.
ऐ! मौत तुझे मुक़म्मल होने के लिए अभी कई और बुलंदी छूनी है
कि ऐसी मौत मरने की चाहत "धरम" ज़माने को तुझसे दुगुनी है
महज़ एक ही ज़िंदगी में कितने और ज़िंदगी निकल जाते हैं
आँखें बंद ही रह जाती हैं "धरम" ख़्वाब सारे निकल जाते हैं
2.
जब कभी "धरम" ख़्वाब में क़ातिल के शक्ल में मसीहा आए
मेरी बाहों में तेरी बाहें आए तस्सबुर में सिर्फ तेरा चेहरा आए
3.
कि जहाँ कुछ भी नहीं होता वहां मेरा ज़माना होता है
वहां के हरेक सन्नाटे से "धरम" मेरा फ़साना होता है
4.
ऐ! मौत तुझे मुक़म्मल होने के लिए अभी कई और बुलंदी छूनी है
कि ऐसी मौत मरने की चाहत "धरम" ज़माने को तुझसे दुगुनी है
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