Sunday, 3 December 2017

चंद शेर

1.
ऐसा कर के मैंने "धरम" पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी
जब भी हिस्से में ख़ुशी आई मैंने ठोकर मार दी

2.
यहाँ अब न तो पैरों तले ज़मीं है न ही सर के ऊपर आसमाँ
कि "धरम" अब तुम निकलो यहाँ से ढूंढो कोई दूसरा जहाँ

3.
कि तुम्हारे दर्द-ए-दिल पर "धरम" सिर्फ तुम्हारा ही हक़ नहीं था
वो मेरी भी किताब-ए-ज़िंदगी का जलता हुआ आखिरी वरक़ था

4.
बिना ज़ुर्म के सजा न हो औ" न ही हो कोई सजा-ए-माफ़
सब को मिलनी चाहिए "धरम" अब यहाँ एक सा इन्साफ

5.
हर रोज सुबह से शाम तलक "धरम" अँधेरे की ही चाहत है
हम ख़ुद को क्या बताएँ कि क्यूँ दिल इस तरह से आहत है

6.
कि मैं ग़ुबार था "धरम" मुझे बस फूंक के उड़ा दिया गया 
औ" छिड़क के पानी बचा-खुचा वज़ूद भी मिटा दिया गया

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