Monday, 26 March 2018

बुझते दिये को मैंने फिर से जलाया है

कि मुरझाया फूल भी यदि मेरे दामन में आया है
मैंने उसे भी इज़्ज़त से अपने माथें पर सजाया है

निकालकर दिल से मुझे जब तुमने ठोकर मार दी
न जाने कितने हाथों ने मेरे ज़ख्मों के सहलाया है

मेरे नाम से जुड़ने का अब तो कोई शौक नहीं तुझे
तुमने उस गुज़रे ज़माने के हर याद को भुलाया है

वो मेरे वफ़ा का क़त्ल भी था औ" थी तेरी मेहरबानी
तेरे उस सितम ने तो मुझे बिना दरिया के डुबाया है

मेरे उम्मीद को फेरने के लिए तेरे पास तो समंदर था
जब भी प्यास लगी उससे एक बूँद भी पानी न पाया है

मैंने बढ़ाया है हाथ फिर से चाहो तो गले लगा लो मुझे
कि एक बुझते दिये को "धरम" मैंने फिर से जलाया है 

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