तेरे साथ का वक़्त-ए-मुलाक़ात भी तो तन्हा ही गुजरता है
आँखें बंद करूँ तो भी तस्सबुर में तेरा चेहरा नहीं उभरता है
तेरे हर रंग-ए-मिजाज़ को मैंने देखा औ" सीने से लगाया भी
वो रंग-ए-उल्फ़त तेरे चेहरे पर देर तलक़ क्यूँ नहीं ठहरता है
ख़ुद को ज़मीं पर रखकर ज़माने से नहीं अपने आप से पूछो
क्यूँ तेरा हर शाग़िर्द तेरे परछाहीं से भी मिलने से मुकरता है
न ही मेरे आखों को सुकूँ मिला न तश्ना-लब की प्यास बुझी
हर वक़्त-ए-मुलाक़ात में तेरा चेहरा ये किस तरह निखरता है
वो रिश्ता जो तेरे ही पहलू में बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ था
मैं सोचता हूँ तो दिल मेरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखरता है
कि मैं अब तो तुझसे फ़ासले पर ही क़याम करता हूँ "धरम"
तुझसे करीबी के बात पर तो जिस्म औ" रूह दोनों सिहरता है
आँखें बंद करूँ तो भी तस्सबुर में तेरा चेहरा नहीं उभरता है
तेरे हर रंग-ए-मिजाज़ को मैंने देखा औ" सीने से लगाया भी
वो रंग-ए-उल्फ़त तेरे चेहरे पर देर तलक़ क्यूँ नहीं ठहरता है
ख़ुद को ज़मीं पर रखकर ज़माने से नहीं अपने आप से पूछो
क्यूँ तेरा हर शाग़िर्द तेरे परछाहीं से भी मिलने से मुकरता है
न ही मेरे आखों को सुकूँ मिला न तश्ना-लब की प्यास बुझी
हर वक़्त-ए-मुलाक़ात में तेरा चेहरा ये किस तरह निखरता है
वो रिश्ता जो तेरे ही पहलू में बे-आबरू होकर हलाक़ हुआ था
मैं सोचता हूँ तो दिल मेरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखरता है
कि मैं अब तो तुझसे फ़ासले पर ही क़याम करता हूँ "धरम"
तुझसे करीबी के बात पर तो जिस्म औ" रूह दोनों सिहरता है
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.