1.
हमने जिस-जिस को पनाह दिया "धरम" वह हर शख़्स नकाबपोश निकला
जब हटा नक़ाब तो हर शख़्स चेहरे का काला औ" ज़ुबाँ का ख़ामोश निकला
2.
अब जो हम दोनों के दरम्याँ है "धरम" वो सिर्फ पर्दादारी है
जो बचा-खुचा रिश्ता का अवशेष है वो सिर्फ एक बीमारी है
3.
जब भी खुलती है आँख 'धरम' तो अंधेरे पर रौशनी का धोखा होता है
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ तो बाद उसके जो होता है वो अनोखा होता है
4.
कि जब भी तुमने ज़ुबाँ खोली "धरम" मेरी इज़्ज़त को किया तार-तार
जब मिलाया हाथ तो महज़ एक ज़ख्म के पीछे दिए ज़ख्म कई हज़ार
5.
कि बाद इस मुलाक़ात के जो भी बचा-खुचा भ्रम था वह टूट गया
ज़ुल्म इतना हुआ 'धरम' की मेरे सब्र का अंतिम घड़ा भी फूट गया
हमने जिस-जिस को पनाह दिया "धरम" वह हर शख़्स नकाबपोश निकला
जब हटा नक़ाब तो हर शख़्स चेहरे का काला औ" ज़ुबाँ का ख़ामोश निकला
2.
अब जो हम दोनों के दरम्याँ है "धरम" वो सिर्फ पर्दादारी है
जो बचा-खुचा रिश्ता का अवशेष है वो सिर्फ एक बीमारी है
3.
जब भी खुलती है आँख 'धरम' तो अंधेरे पर रौशनी का धोखा होता है
औ" ग़र खुल गई ज़ुबाँ तो बाद उसके जो होता है वो अनोखा होता है
4.
कि जब भी तुमने ज़ुबाँ खोली "धरम" मेरी इज़्ज़त को किया तार-तार
जब मिलाया हाथ तो महज़ एक ज़ख्म के पीछे दिए ज़ख्म कई हज़ार
5.
कि बाद इस मुलाक़ात के जो भी बचा-खुचा भ्रम था वह टूट गया
ज़ुल्म इतना हुआ 'धरम' की मेरे सब्र का अंतिम घड़ा भी फूट गया
No comments:
Post a Comment
Note: only a member of this blog may post a comment.