कि कब दरिया में डूबा किसकी कश्ती से लगकर कैसा किनारा मिला
कुछ भी पता न चला किसके हाथों डूबते रिश्ते को कैसा सहारा मिला
कि ख़ुद की किताब-ए-हिज़्र पर जब अपनी ही तन्हाई की रौशनी डाली
हर वरक़ में मुझे सिर्फ़ चाँद की परछाहीं मिली सूरज का अँधेरा मिला
कि ज़माने के महफ़िल में लौ के बुझने तलक हर दिये को निहारा गया
बाद उसके किसी के हिस्से में न कभी रौशनी आई न कोई बसेरा मिला
कि जब कभी किसी एक ख़्वाब को तोड़कर दूसरे ख़्वाब से जोड़ा गया
तो दरम्याँ दोनों ख़्वाब के ग़ुबार भर आया सिर्फ धुंधला नज़ारा मिला
कि जब हर सन्नाटा सिर्फ़ सिसकी से टूटे तो कौन किससे सवाल करे
दो ज़िस्म के दरम्याँ उग आए फ़ासले को बढ़ने का एक इशारा मिला
कि जब भी ख़ुद को पलट कर देखा वीरान दश्त का एक पत्थर पाया
अपना नक्श-ए-पाँ तो न पाया मगर हाँ! हर ज़ख्म "धरम" ठहरा मिला
कुछ भी पता न चला किसके हाथों डूबते रिश्ते को कैसा सहारा मिला
कि ख़ुद की किताब-ए-हिज़्र पर जब अपनी ही तन्हाई की रौशनी डाली
हर वरक़ में मुझे सिर्फ़ चाँद की परछाहीं मिली सूरज का अँधेरा मिला
कि ज़माने के महफ़िल में लौ के बुझने तलक हर दिये को निहारा गया
बाद उसके किसी के हिस्से में न कभी रौशनी आई न कोई बसेरा मिला
कि जब कभी किसी एक ख़्वाब को तोड़कर दूसरे ख़्वाब से जोड़ा गया
तो दरम्याँ दोनों ख़्वाब के ग़ुबार भर आया सिर्फ धुंधला नज़ारा मिला
कि जब हर सन्नाटा सिर्फ़ सिसकी से टूटे तो कौन किससे सवाल करे
दो ज़िस्म के दरम्याँ उग आए फ़ासले को बढ़ने का एक इशारा मिला
कि जब भी ख़ुद को पलट कर देखा वीरान दश्त का एक पत्थर पाया
अपना नक्श-ए-पाँ तो न पाया मगर हाँ! हर ज़ख्म "धरम" ठहरा मिला
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