Wednesday, 3 July 2019

चंद शेर

1.
क्यूँ किनारा नहीं लगती ज़िंदगी  क्यूँ कोई ख़्वाब उभरकर नहीं आता
बहार के मौसम में भी "धरम" क्यूँ कोई हिज़्र भी उभरकर नहीं आता

2.
अपने पाँव तले अपनी ज़मीं कब थी "धरम" अपने सर के ऊपर अपना आसमाँ कब था
अपनी ज़िंदगी कितने ही कब्र से होकर गुजरी मगर उसमें कोई भी अपना जहाँ कब था

3.
ज़िंदगी इस शक्ल से गुज़री "धरम" कि हर हद तक नासाज़ रही
लिखने के लिए न हाथ रहा बोलने के लिए न मुँह में आवाज़ रही

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