Wednesday, 24 July 2019

यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता

ख़्वाब कैसा भी हो उसे भर नज़र देखना जरुरी होता है
ये हम कैसे कह दें कि इश्क़ का हर रंग सिंदूरी होता है

ये सारे सामईन को कद्रदान समझूँ या फिर ग़ुलाम तेरा
तेरी महफ़िल में हर किसी का जवाब जी हुज़ूरी होता है

कैसे कह दें कि ये बोझ अब तो कभी न उठाया जाएगा
यहाँ अपनी लाश अपने कंधे पर ढ़ोना रोजगारी होता है

एक ज़िस्म दो रूहों को अपने अंदर कब उतार लेता है 
जब दोनों रूहों  का दोनों जिस्मों  पर सरदारी  होता है

ग़ुलाम के क़दमों में यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता 
दोनों एक अलग ही  दर्ज़े का "धरम" व्यापारी  होता है

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