Sunday, 28 July 2019

सबका जनाज़ा किया गया

कि हर दीवार ऊँची करके मेरे कद को छोटा किया गया
खरा सोना था  मुझे पत्थर पर रगड़कर  खोटा किया गया

रुस्वा तो सिर्फ नाम हुआ था सज़ा पूरे ज़िस्म को यूँ मिली
पहले क़त्ल किया फिर उस क़त्ल का तमाशा किया गया 

अपने हुदूद-ए-ग़म  का मुझे कभी ख़ुद  ही अंदाज़ा न था
पहले तो  ज़माने ने हिसाब किया  फिर धोखा किया गया

मेरे लिए हर किसी का लिखा कलाम नश्तर बन गया था
करके क़त्ल ज़िस्म पर ज़ख्म न देने का वादा किया गया

रिश्ते में जब से ज़ुल्म शुरू हुआ  तब से ज़िंदगी शुरू हुई
हर ज़ुल्म के बाद  उससे मिले मौत को  आधा किया गया

शक़्ल  उसकी थी  नग़मा मेरा था  आवाज़  रक़ीब की थी
एक ही ख़्वाब के बाद "धरम" सबका जनाज़ा किया गया 

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