कि हर दीवार ऊँची करके मेरे कद को छोटा किया गया
खरा सोना था मुझे पत्थर पर रगड़कर खोटा किया गया
रुस्वा तो सिर्फ नाम हुआ था सज़ा पूरे ज़िस्म को यूँ मिली
पहले क़त्ल किया फिर उस क़त्ल का तमाशा किया गया
अपने हुदूद-ए-ग़म का मुझे कभी ख़ुद ही अंदाज़ा न था
पहले तो ज़माने ने हिसाब किया फिर धोखा किया गया
मेरे लिए हर किसी का लिखा कलाम नश्तर बन गया था
करके क़त्ल ज़िस्म पर ज़ख्म न देने का वादा किया गया
रिश्ते में जब से ज़ुल्म शुरू हुआ तब से ज़िंदगी शुरू हुई
हर ज़ुल्म के बाद उससे मिले मौत को आधा किया गया
शक़्ल उसकी थी नग़मा मेरा था आवाज़ रक़ीब की थी
एक ही ख़्वाब के बाद "धरम" सबका जनाज़ा किया गया
खरा सोना था मुझे पत्थर पर रगड़कर खोटा किया गया
रुस्वा तो सिर्फ नाम हुआ था सज़ा पूरे ज़िस्म को यूँ मिली
पहले क़त्ल किया फिर उस क़त्ल का तमाशा किया गया
अपने हुदूद-ए-ग़म का मुझे कभी ख़ुद ही अंदाज़ा न था
पहले तो ज़माने ने हिसाब किया फिर धोखा किया गया
मेरे लिए हर किसी का लिखा कलाम नश्तर बन गया था
करके क़त्ल ज़िस्म पर ज़ख्म न देने का वादा किया गया
रिश्ते में जब से ज़ुल्म शुरू हुआ तब से ज़िंदगी शुरू हुई
हर ज़ुल्म के बाद उससे मिले मौत को आधा किया गया
शक़्ल उसकी थी नग़मा मेरा था आवाज़ रक़ीब की थी
एक ही ख़्वाब के बाद "धरम" सबका जनाज़ा किया गया
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