रास्ते की हर रौशनी जीवन में एक नया अँधेरा लाता था
वो उगता हुआ सूरज कहाँ कभी मेरे लिए सवेरा लाता था
वो उगता हुआ सूरज कहाँ कभी मेरे लिए सवेरा लाता था
साथ ज़माने भर का था तो जरूर मगर कभी पता न चला
कि कौन मेरे लिए समंदर लाता था कौन किनारा लाता था
यूँ तो नए ज़ख्मों का दर्द बड़ा ही नायाब होता था मगर क्यूँ
दिल उस सख्श को ढूंढता था जो हर ज़ख्म दुबारा लाता था
वक़्त अब मरहम अपने साथ ले जाता है ज़ख्म छोड़ देता है
कहाँ गया वो वक़्त जो साथ अपने चंद लम्हें आवारा लाता था
बाद एक शाम के दूसरी शाम हो जाती थी दिन नहीं होता था
रात ज़िंदगी तो क्या मौत के लिए भी न कोई सहारा लाता था
न जाने क्यूँ अपनो के बीच भी "धरम" हमेशा दम घुँटता था
वो कौन था जो हर रोज मेरे लिए साँस का पिटारा लाता था
Bhut sundar sir.
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