क़त्ल को इलाही ये क़त्ल का नाम नहीं देंगे
ये हुक्मरान अब तो कोई भी पैग़ाम नहीं देंगे
ये हुक्मरान अब तो कोई भी पैग़ाम नहीं देंगे
सज्दे में गर्दनें झुकी रहेंगी क़त्ल भी होंगी
अलावा ज़ब्र के कोई और इनाम नहीं देंगे
करम की बातें होंगी होंठ भी सिले जाएँगे
ख़ुद आपको आपका ही कलाम नहीं देंगे
आपके लहू की क़ीमत किसी मोल का नहीं
आपकी शहादत पर भी वो सलाम नहीं देंगे
न शिकस्त न फ़त्ह न ही दरमियाँ की बुलंदी
हाथ थामकर भी 'धरम' कोई मक़ाम नहीं देंगे
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